Baarat



 बारात 


मेरी नानी के अनुसार अशोक मामा ने अपनी होने वाली पत्नी को पहली बार प्रेम मौसी के घर के बाहर हैंड पंप पर पानी पीते हुए देखा था, जैसे भगवान् राम जी ने पुष्प वाटिका में माँ सीता को देखा था।  प्रेम मौसी आसनसोल में रहती थी जहाँ मौसा रेलवे में काम करते थे। नानी की चार बेटियां थीं और शंकराचार्य की तरह वे हर बेटी के घर कुछ समय बिताती थी। मेरे घर के सामने एक रिक्शा रुकता था और उससे नानी उतरती थी।  फिर दो दिन तक हम लोग नानी से मंत्र मुग्ध हो कर आसनसोल की कहानियां सुनते थे।  नानी से मालूम चला कि अशोक मामा रूपम मामी को देख कर इतने कटिबद्ध हो गए कि उन्होंने मामी के घर का पता निकाला और शादी तय कर ही छोड़ा ।  मेरी होने वाली मामी का घर सीताराम पुर में था और वे आसनसोल स्कूल में पढ़ने आतीं थीं।  अशोक मामा पहले  मेरे ननिहाल के गावं में रहते थे लेकिन प्रेम मौसी को लगा के वे इतने तेज़ तर्रार थे कि उनकी प्रतिभा का आसनसोल जैसी जगह में ही सदुपयोग हो सकता है।  मौसी का निर्णय सही निकला, अशोक मामा व्यवसाय में बहुत सफल हुए। 


मैं नवीं कक्षा में था जब माँ को शादी के निमंत्रण का पोस्टकार्ड आया।  हमलोग बस से माँ के गाँव डुम्मर पहुंचे। बारात को स्टेशन पहुँचाने के लिए दो वाहन थे।  वर और वर के पिता कार से चले और बांकी लोग ट्रक में।  शाम होते हमलोग कुर्सेला स्टेशन पहुंचे। इस यात्रा से पहले मैं अपने जन्मस्थान के पच्चीस किलोमीटर के दायरे में रहा था।  ये बारात मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी, मेरे जीवन की सबसे लम्बी यात्रा।  अशोक मामा के सबसे छोटे भाई असीम मामा मेरी ही उम्र के थे और हम दोनों पुरे समय साथ रहते थे।  पटना से मेरी बड़ी मौसी के बेटे अजित भैया आये थे।  भैया बड़े हैंडसम थे और उनका रुझान फिल्मों में काम करने का था।  लड़कियों को उनकी दाढ़ी बहुत पसंद थी। भैया मुकेश के गाने गाते थे और उनके पास ढेर सारे चुटकुलों का भंडार था। अजीत भैया जहाँ भी होते थे उनके इर्द लोगों का झुण्ड होता था।   उनकी ही उम्र के शेखर भैया और बड़ी मामी के छोटे भाई देवेंद्र थे।  युवक लोगों का अच्छा ग्रुप बन गया था। बारात में गाँव के चार नौकर भी साथ थे।  


मैं ट्रेन की खिड़की के पास बैठ गया।  जब हम किसी गांव या शहर के पास से गुजरते थे, शादी का मौसम होने कारण, लाउडस्पीकर से गानों की आवाज़ आती थी।  मैंने हैरान हुआ कि हर जगह एक ही फ़िल्मी गाना बजता सुनाई देता था। जब ट्रेन गांव के पास से गुजरती थी तो गानों की आवाज़ पहले थोड़ा कम, फिर काफी तेज़, और फिर कम हो जाती थी।  बाद में मुझे डोप्पलर इफेक्ट के बारे में पता चला।  


नौकरों का काम था कैनिस्टर और सखुवा के पत्तल ढोना। टिन में  ढेर सारी सेव और बुंदिया थी।  हमलोगों को सीताराम पहुंचने में दो दिन लगे और हमारा नाश्ता, दिन और रात का खाना सेव और बुंदिया था।  मैं सोच रहा था कि अगर मुझे सारा जीवन यही खाने को मिले तो कितना अच्छा हो।  


हम लोग सीताराम पहुंचे और हमें रेलवे के वेटिंग रूम ठहराया गया। मामी के पिताजी रेलवे में काम करते थे और उन्हें  रेलवे वेटिंग रूम को इस्तेमाल करने की अनुमति थी। बारात के ठहरने की जगह को जनवासा कहते थे।  परम्परा के अनुसार कन्या के घर से एक तौलिया, दो चार साबुन की टिकिया और सुगन्धित तेल की व्यवस्था थी।  हमसे मिलने के की लिए मामी एक रिश्तेदार आये थे उन्होंने, वर के पिता नुन्नू मामा की किसी बात पर अवहेलना कर दी।  वर के पिता बड़े नाराज़ हुए।  किसी ने धमकी दी के बारात बिना शादी के वापस चली जाएगी।  अशोक मामा ने बीच बचाव करके मामला ठंडा किया।  और शाम में बैंड बाजे और नांच के साथ हम लोग मामी के घर पहुंचे।  मामी की कई सहेलियां आईं थी और वे झुण्ड में बारात के युवकों के साथ बात करने लगी। बारात के स्वागत में गुलाब जल की फुहार और सुगन्धित रुई भरी हुई प्लास्टिक के गुलाब मिले।   


अगले दिन सवेरे लड़की के घर से बारात के नाश्ते के लिए दही और चुरा पहुंचा, जो मेरा प्रिय भोजन था।  वर के पिता, नुन्नू मामा आग बबूला हो गए कि जो खाना हम नौकरों को खिलाते थें, वही जमींदार साहब को खिलाया जा रहा था।  उन्हें इसमें साज़िश दिखीं उस व्यक्ति की जिनसे उनका एक दिन पहले झगड़ा हुआ था।  लड़की के पिता ने करबद्ध क्षमा याचना की और मैंने निराश हो कर दही और चुरा को वापस जाते हुए देखा।  


दोपहर में मैंने देखा मामी की सहेलियां युवकों से मिलने के लिए जनवासा आ गयीं और काफी देर तक लोगों में 

बातचीत चलती रही।  सहेलियों में लड़की थी खत्री जो अजीत भैया से काफी प्रभावित थी।  सबके अनुरोध और भैया ने मुकेश का गाया “ये  मेरा दीवानापन है, या मुहब्बत कर शुरुर, तू न पहचाने तो ये है तेरी नज़रों का कुसूर”।  मैंने प्रण किया की बड़े होकर मैं भी अजीत भैया जैसा गाऊंगा। 


वापसी में ट्रेन पर माहौल कही ठंडा था।  मैं और असीम मामा डब्बे में चहल कदम कर रहे थे।  हमने देखा की मामा बिस्तर के चादर से एक कम्पार्टमेंट को कमरा जैसा बना रहे थे।  हम लोग रुके तो मामा चादर के बीच से चेहरा निकल कर बोले,” दोनों भागता है कि थप्पड़ लगायें!”  हम लोग भागे और सबसे दूर वाले कम्पार्टमेंट में सहम कर बैठ गए।  


बारात जैसे ही गाँव पहुंची कि महिलाओं ने युवकों का कोर्ट मार्शल चालू हो गया। आरोप, “लड़कियां जनवासे क्यों आयीं??”  किसी बुजुर्ग ने चाव ले ले कर चुगली कर दी थी।  गवाही में मुझे बुलाया गया और मैंने सब कुछ ईमानदारी से बयान किया जिसने आग में घी डालने का काम किया।  अजीत भैया से खत्री वाली लड़की सफाई मांगी गयी।  महिलाओं को डर था कि कोई युवक वापस सीतारामपुर तो नहीं चला जायेगा।  अंत में परेशान होकर शेखर भैया ने कहा, “आखिर हम त जवान बानी , का करीं।” मुझे लगा कि इस तर्क के बाद धर्म रक्षिणी सभा समाप्त हो जाएगी।  लेकिन महिलायें टस से मस नहीं हुंईं और अदालत जारी रही।  


इस कहानी को आज चालीस साल से ज्यादा हो गए हैं।  अशोक मामा और रूपम मामी का दो पुत्रों के साथ  सुखी वैवाहिक जीवन चल रहा है।  

    


       


  


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